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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अथ) और फिर (अव्रात्यः) अव्रात्य [कुव्रतधारी] (व्रात्यब्रुवः) अपने को व्रात्य [सत्यव्रतधारी] बताता हुआ, (नामबिभ्रती) केवल नाम धारण करता हुआ (अतिथिः) अतिथि (यस्य) जिस [गृहस्थ] के (गृहान्) घरों में (आगच्छेत्) आजावे ॥११॥
भावार्थभाषाः - यदि कोई छली-कपटीमिथ्यावादी मनुष्य अपने को सत्यव्रतधारी अतिथि बताकर आजावे, गृहस्थ उस पाखण्डीधूर्त को अवश्य निरादर करके निकाल देवे, और अगले दो मन्त्रों के अनुसार वर्तावकरे ॥११, १२॥
टिप्पणी: ११−(अथ) अपि च (यस्य)गृहस्थस्य (अव्रात्यः) असत्यव्रतधारी (व्रात्यब्रुवः) व्रात्य+ब्रूञ् व्यक्तायांवाचि-क। आत्मानं व्रात्यं कथयन् (नामबिभ्रती) नाम+डुभृञ् धारणपोषणयोः-शतृ।इयाडियाजी-कराणामुपसंख्यानम्। वा० पा० ७।१।३९। ईकारादेशः सुविभक्तेः। नामधारयन्।अन्यत् पूर्ववत् ॥
