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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि और अनतिथि के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) सो (एवम्)व्यापक परमात्मा को (विद्वान्) जानता हुआ (व्रात्यः) व्रात्य [सत्यव्रतधारी] (अतिथिः) अतिथि (एकाम् रात्रीम्) एक रात्रि (यस्य) जिस [गृहस्थ] के (गृहे) घरमें (वसति) वसता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् गृहस्थ पुरुषआप्त सदाचारी अतिथि को एक दिन ठहरा कर उससे उपकारी भूमिविद्या ग्रहण करके लोगोंमें प्रतिष्ठा पावे ॥१, २॥
टिप्पणी: १−(तत्) अनन्तरम् (यस्य) गृहस्थस्य (एवम्) व्यापकं परमात्मानम् (विद्वान्) जानन् (व्रात्यः)सत्यव्रतधारी (एकाम्) (रात्रिम्) कालात्यन्तसंयोगे द्वितीया (अतिथिः) (गृहे) (वसति) तिष्ठति ॥
