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अथ॒ य ए॒वंवि॒दुषा॒ व्रात्ये॒नान॑तिसृष्टो जु॒होति॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अथ । य: । एवम् । विदुषा । व्रात्येन । अनतिऽसृष्ट: । जुहोति ॥१२.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:12» पर्यायः:0» मन्त्र:8


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

यज्ञ करने में विद्वान् की सम्मति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अथ) और फिर (यः) जो [गृहस्थ] (एवम्) व्यापक परमात्मा को (विदुषा) जानते हुए (व्रात्येन) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] करके (अनतिसृष्टः) नहीं आज्ञा दिया हुआ (जुहोति) यज्ञ करताहै ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो अयोग्य गृहस्थनीतिज्ञ वेदवेत्ता अतिथि की आज्ञा बिना मनमाना काम करने लगता है, वह अनधिकारीहोने से शुभ कार्य सिद्ध नहीं कर सकता और न लोग उसकी कुमर्यादा को मानते हैं॥८-११॥
टिप्पणी: ८−(अथ) अपि च (अनतिसृष्टः) अनाज्ञापितः। अन्यत् पूर्ववत्-म० ४ ॥