देवता: त्रिपदा प्राजापत्या त्रिष्टुप्
ऋषि: अध्यात्म अथवा व्रात्य
छन्द: अथर्वा
स्वर: अध्यात्म प्रकरण सूक्त
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
यज्ञ करने में विद्वान् की सम्मति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अस्मिन् लोके) इससंसार में (अस्य) उस [गृहस्थ] की (आयतनम्) मर्यादा (परि) सब प्रकार (शिष्यते)शेष रह जाती है, (यः) जो [गृहस्थ] (एवम्) व्यापक [परमात्मा] को (विदुषा) जानतेहुए (व्रात्येन) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] करके (अतिसृष्टः) आज्ञा दिया हुआ (जुहोति) यज्ञ करता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ को योग्य है किआदरपूर्वक विद्वान् मर्यादापुरुष सत्यव्रतधारी अतिथि की आज्ञा से उत्तम-उत्तमकर्म करता रहे, जिससे उसकी मर्यादा और कीर्ति संसार में स्थिर होवे ॥४-७॥
टिप्पणी: ७−(परि)सर्वतः (अस्य) गृहस्थस्य (अस्मिन्) दृश्यमाने (लोके) संसारे (आयतनम्)यती-ल्युट्। मर्यादाम्। आश्रयः (शिष्यते) अवशिष्टं वर्तते। अन्यत् पूर्ववत्-म० ४॥
