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स्व॒यमे॑नमभ्यु॒देत्य॑ ब्रूया॒द्व्रात्याति॑ सृज हो॒ष्यामीति॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्वयम् । एनम् । अभिऽउदेत्य । ब्रूयात् । व्रात्य । अति । सृज । होष्यामि । इति ॥१२.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:12» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

यज्ञ करने में विद्वान् की सम्मति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - वह [मनुष्य] (स्वयम्)आप ही (अभ्युदेत्य) सामने से उठकर (एनम्) इस [अतिथि] से (ब्रूयात्)कहे−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [सत्यव्रतधारी] (अति सृज) आज्ञा दे, (होष्यामि इति)मैं हवन करूँगा ॥२॥
भावार्थभाषाः - यदि यज्ञसामग्रीउपस्थित और यज्ञ आरम्भ होने पर विद्वान् ब्रह्मवादी अतिथि आजावे, गृहस्थ आदरपूर्वक उस महामान्य की सम्मति लेकर यज्ञ करे ॥१, २॥
टिप्पणी: २−(स्वयम्) आत्मना (एनम्)अतिथिम् (अभ्युदेत्य) अभिमुखमुत्थाय (ब्रूयात्) कथयेत् (व्रात्य) (अति सृज)आज्ञापय (होष्यामि) होमं यज्ञं करिष्यामि (इति) ॥