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नास्या॒स्मिंल्लो॒क आ॒यत॑नं शिष्यते॒ य ए॒वं वि॒दुषा॒ व्रात्ये॒नान॑तिसृष्टोजु॒होति॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न । अस्य । अस्मिन् । लोके । आऽयतनम् । शिष्यते । य: । एवम् । विदुषा । व्रात्येन । अनतिऽसृष्ट:। जुहोति ॥१२.११॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:12» पर्यायः:0» मन्त्र:11


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

यज्ञ करने में विद्वान् की सम्मति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्मिन् लोके) इससंसार में (अस्य) उस (गृहस्थ) की (आयतनम्) मर्यादा (न शिष्यते) शेष नहीं रहतीहै, (यः) जो (एवम्) व्यापक परमात्मा को (विदुषा) जानते हुए (व्रात्येन) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] करके (अनतिसृष्टः) नहीं आज्ञा दिया हुआ (जुहोति) यज्ञकरता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - जो अयोग्य गृहस्थनीतिज्ञ वेदवेत्ता अतिथि की आज्ञा बिना मनमाना काम करने लगता है, वह अनधिकारीहोने से शुभ कार्य सिद्ध नहीं कर सकता और न लोग उसकी कुमर्यादा को मानते हैं॥८-११॥
टिप्पणी: ११−(न) निषेधे (अनतिसृष्टः) अनाज्ञापितः। अन्यत् पूर्ववत्-म० ७ ॥