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यदे॑न॒माह॑व्रात्योद॒कमित्य॒प ए॒व तेनाव॑ रुन्द्धे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । एनम् । आह । व्रात्य । उदकम् । इति । अप: । एव । तेन । अव ।रुन्ध्दे ॥११.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:11» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (एनम्) इस [अतिथि] से (आह) वह [गृहस्थ] कहता है−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [सद्व्रतधारी] (उदकम् इति) यह जल है−(तेन) उस [सत्कार] से (एव) निश्चय करके (अपः) सत्कर्म को (अव रुन्द्धे) वह [अपने लिये] सुरक्षित करता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - अतिथि को जल आदि देनेसे गृहस्थ सत्कर्मी होता है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(अपः) आपः कर्माख्यायां ह्रस्वो नुट् च वा। उ०४।२०८। आप्लृ व्याप्तौ-असुन् ह्रस्वश्च। कर्म-निघ० २।१। सत्कर्म। अन्यत्पूर्ववत् ॥