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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (एनम्) इस [अतिथि] से (आह) वह [गृहस्थ] कहता है−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [सद्व्रतधारी] (क्व) कहाँ (अवात्सीः इति) [रात्रि में] तू रहा था ? (तेन) उस [सत्कार] से (एव)निश्चय करके (देवयानान्) विद्वानों के चलने योग्य (पथः) मार्गों को (अवरुन्द्धे) वह [अपने लिये] सुरक्षित करता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - अतिथि के साथप्रीतिपूर्वक वार्तालाप करने से गृहस्थ उसके उपदेश द्वारा सन्मार्ग पर चल करआनन्द भोगे ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यत्) यदा (एनम्) अतिथिम् (आह) ब्रूते (पथः) मार्गान् (एव)निश्चयेन (तेन) सत्कारेण (देवयानान्) विद्वद्भिर्गन्तव्यान् (अव रुन्द्धे)आत्मने सुरक्षति। अन्यत् पूर्ववत् ॥
