वांछित मन्त्र चुनें

यदे॑न॒माह॒व्रात्य॒ क्वावात्सी॒रिति॑ प॒थ ए॒व तेन॑ देव॒याना॒नव॑ रुन्द्धे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । एनम् । आह । व्रात्य । क्व । अवात्सी: । इति । पथ: । एव । तेन । देवऽयानान् । अव । रुन्ध्दे ॥११.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:11» पर्यायः:0» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (एनम्) इस [अतिथि] से (आह) वह [गृहस्थ] कहता है−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [सद्व्रतधारी] (क्व) कहाँ (अवात्सीः इति) [रात्रि में] तू रहा था ? (तेन) उस [सत्कार] से (एव)निश्चय करके (देवयानान्) विद्वानों के चलने योग्य (पथः) मार्गों को (अवरुन्द्धे) वह [अपने लिये] सुरक्षित करता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - अतिथि के साथप्रीतिपूर्वक वार्तालाप करने से गृहस्थ उसके उपदेश द्वारा सन्मार्ग पर चल करआनन्द भोगे ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यत्) यदा (एनम्) अतिथिम् (आह) ब्रूते (पथः) मार्गान् (एव)निश्चयेन (तेन) सत्कारेण (देवयानान्) विद्वद्भिर्गन्तव्यान् (अव रुन्द्धे)आत्मने सुरक्षति। अन्यत् पूर्ववत् ॥