पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एनम्) उस [गृहस्थ] को (निकामः) लालसा (आ) आकर (गच्छति) मिलती है, वह (निकामस्य) लालसा की (निकामे)निरन्तर पूर्ति में (भवति) होता है, (यः) जो [गृहस्थ] (एवम्) ऐसे [विद्वान्] को (वेद) जानता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ को योग्य है किआप्त विद्वान् अतिथि का अनेक प्रकार सत्कार करके उन्नति की अभिलाषाओं को पूराकरे ॥११॥
टिप्पणी: ११−(निकामः) लालसा (निकामे) निरन्तरकामे। इच्छापूर्तौ (निकामस्य)लालसायाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
