वांछित मन्त्र चुनें

तद्यस्यै॒वंवि॒द्वान्व्रात्योऽति॑थिर्गृ॒हाना॒गच्छे॑त् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

व्रात्य: । अतिथि: । तत् । यस्य । एवम् । विद्वान् । व्रात्य: । राज्ञ: । अतिथि: । गृहान् । आऽगच्छेत् ॥११.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:11» पर्यायः:0» मन्त्र:1


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) सो (एवम्)व्यापक परमात्मा को (विद्वान्) जानता हुआ (व्रात्यः) व्रात्य [सद्व्रतधारी] (अतिथिः) अतिथि [नित्य मिलने योग्य सत्पुरुष] (यस्य) जिस [पुरुष] के (गृहान्)घरों में (आगच्छेत्) आवे ॥१॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थों को चाहिये किजब कोई विद्वान् महामान्य अतिथि घर पर आवे, प्रीतिवचन, जल, अन्न आदि पदार्थोंसे उसकी सेवा करें ॥१, २॥यह दोनों मन्त्र महर्षिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका अतिथियज्ञविषय पृष्ठ २७१ में व्याख्यात हैं ॥
टिप्पणी: १-व्याख्यातम्-सू० १०म० १ ॥