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ऐनं॒ ब्रह्म॑गच्छति ब्रह्मवर्च॒सी भ॑वति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । एनम् । ब्रह्म । गच्छति । ब्रह्मऽवर्चसी । भवति ॥१०.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:8


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथिसत्कार की महिमा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एनम्) उस [पुरुष] को (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञानी समूह (आ) आकर (गच्छति) मिलता है, और वह (ब्रह्मवर्चसी)ब्रह्मवर्चसी [वेदाभ्यास से तेजस्वी] (भवति) होता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य प्रजापालक औरअतिथिसत्कारक होकर वेदज्ञानियों के साथ विराजकर ब्रह्मवर्चसी होवे ॥८, ९॥
टिप्पणी: ८−(आ) आगत्य (एनम्)ब्रह्मज्ञम् (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञानिसमूहः (गच्छति) प्राप्नोति (ब्रह्मवर्चसी)ब्रह्मणा वेदाध्ययनेन तदनुष्ठानेन च तेजस्वी (भवति) ॥