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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिसत्कार की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह (अग्निः)अग्नि [अग्निसमान तेजस्वी] (एव) निश्चय करके (उ) ही (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञानी समूहहै और (असौ) वह (आदित्यः) सूर्य [सूर्यसमान प्रतापी] (क्षत्रम्) क्षत्रियसमूहहै ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य वेदों के मननसे अग्निसमान तेजस्वी और प्रजापालन से सूर्यसमान प्रतापी होवें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(अयम्)दृश्यमानः (वे) निश्चयेन (उ) एव (अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी (ब्रह्म)ब्रह्मज्ञानिसमूहः (असौ) प्रसिद्धः (आदित्यः) आदीप्यमानः सूर्यः (क्षत्रम्)क्षत्रियकुलम् ॥
