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अतो॒ वैबृह॒स्पति॑मे॒व ब्र॑ह्म॒ प्रावि॑श॒दिन्द्रं॑ क्ष॒त्रं ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अत: । वै । बृहस्पतिम् । एव । ब्रह्म । प्र । अविशत् । इन्द्रम् । क्षत्रम् ॥१०.५॥

अथर्ववेद » काण्ड:15» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:5


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथिसत्कार की महिमा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्यो !] (अतः)इस [अतिथिसत्कार] से (वै) निश्चय करके (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञानी समूह ने (बृहस्पतिम्) बड़े-बड़े प्राणियों के रक्षक गुण [वेदज्ञान आदि] में (एव) ही (प्र अविशत्) प्रवेश किया है, और (क्षत्रम्) क्षत्रियकुल ने (इन्द्रम्) परमऐश्वर्य में [प्रवेश किया है] ॥५॥
भावार्थभाषाः - इस चक्ररूप संसार मेंयही नियम सदा से है कि ब्रह्मज्ञानियों ने वेदज्ञान आदि से और क्षत्रियों ने परमऐश्वर्य बढ़ाने से प्रतिष्ठा पायी है ॥५॥
टिप्पणी: ५−(प्र अविशत्) प्रविष्टमभवत्। अन्यत्पूर्ववत्-म० ४ ॥