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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिसत्कार की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अतः) इस [अतिथिसत्कार] से (वै) निश्चय करके (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञानी कुल (बृहस्पतिम्) बड़े-बड़े प्राणियों के रक्षक गुण में (एव) ही (प्र विशतु) प्रवेश करे, (तथा) उसी प्रकार [अतिथिसत्कार] से (वै) निश्चय करके (क्षत्रम्) क्षत्रियकुल (इन्द्रम्) परमऐश्वर्य में [प्रवेश करे], (इति) ऐसा [अतिथि कहे] ॥४॥
भावार्थभाषाः - आप्त अतिथि मन्त्र ३का उत्तर देवे कि ब्रह्मज्ञानी पुरुष प्राणियों की रक्षा का और राजा लोग ऐश्वर्यप्राप्ति का प्रयत्न करते रहें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(बृहस्पतिम्) बृहतां प्राणिनां पालकं गुणम् (एव) निश्चयेन (प्र विशतु) प्रविष्टं भवतु (इन्द्रम्) परमैश्वर्यम् (तथा)तद्विधानेन सत्कारेण (इति) पादपूर्तौ। अन्यत् पूर्ववत्-म० ३ ॥
