देवता: द्विपदा प्राजापत्या पङ्क्ति
ऋषि: अध्यात्म अथवा व्रात्य
छन्द: अथर्वा
स्वर: अध्यात्म प्रकरण सूक्त
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिसत्कार की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अतः) इस [अतिथिसत्कार] से (वै) निश्चय करके (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञानी कुल (च च) और (क्षत्रम्)क्षत्रिय कुल (उत् अतिष्ठताम्) दोनों ऊँचे होवें, (ते) वे दोनों (अब्रूताम्)कहें−(कम्) किस [गुण] में (प्र विशाव इति) हम दोनों प्रवेश करें ॥३॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मज्ञानी औरक्षत्रिय लोग अतिथि का सत्कार करके विचार करें कि कौन से गुण स्वीकारकरने से हमारी उन्नति होवे। इस का उत्तर आगे है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(अतः) एतस्मात् सत्कारात् (वै) निश्चयेन (ब्रह्म) ब्रह्मवादिकुलम् (च) (क्षत्रम्) क्षत्रियकुलम् (च) (उत्)उदेत्य (अतिष्ठताम्) तिष्ठताम् (ते) द्वे (अब्रूताम्) कथयताम् (कम्) कं गुणम् (प्र विशाव) आवां प्रविष्टौ भवाम (इति) ॥
