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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथिसत्कार की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [राजा] (एनम्) उस [अतिथि] को (आत्मनः) अपने से (श्रेयांसम्) अधिक श्रेष्ठ (मानयेत्) सन्मान करे, (तथा) उस प्रकार [सत्कार] से वह [राजा] (क्षत्राय) क्षत्रिय कुल के लिये (न)नहीं (आ) कुछ (वृश्चते) दोषी होता है, और (तथा) उस प्रकार से (राष्ट्रम्) राज्यके लिये भी (न) नहीं (आ) कुछ (वृश्चते) दोषी होता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जब ब्रह्मवादी आप्तविद्वान् अतिथि राजा के घर आवे, राजा उसको अपने से अधिक गुणी जानकर यथावत्सत्कार करे, जिस से उसके सदुपदेश से दोषों के मिटने पर उसके कुल की और राज्य कीवृद्धि होवे ॥१, २॥
टिप्पणी: २−(श्रेयांसम्) प्रशस्यतरम् (आत्मनः) आत्मसकाशात् (मानयेत्)सत्कुर्यात् (तथा) तेन प्रकारेण (क्षत्राय) क्षत्रियकुलाय (न) निषेधे (आ) ईषत् (वृश्चते) वृश्च्यते। छिद्यते। दूषितो भवति (राष्ट्राय) राज्यसंपादनाय। अन्यद्गतम् ॥
