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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्माऔर जीवात्मा का उपदेश अथवा सृष्टिविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [परमात्मा अपने] (नीलेन) निश्चित ज्ञान से (एव) ही (अप्रियम्) अप्रिय (भ्रातृव्यम्) वैरी [विघ्न]को (प्र ऊर्णोति) ढक देता है और (लोहितेन) उत्पादन सामर्थ्य से (द्विषन्तम्)द्रोह करते हुए [विघ्न] को (विध्यति) बीधता [छेद डालता] है−(इति) ऐसा (ब्रह्मवादिनः) ब्रह्मवादी लोग (वदन्ति) कहते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अपने अटलज्ञान से सब विघ्नों को हटाकर अपने भक्तों को आनन्द देता है, यह सब बुद्धिमानोंका मत है ॥८॥
टिप्पणी: ८−(नीलेन) म० ७। निश्चितज्ञानेन (एव) (अप्रियम्) अनिष्टम् (भ्रातृव्यम्) शत्रुम्। विघ्नम् (प्रोर्णोति) आच्छादयति (लोहितेन) म० ७।उत्पादनसामर्थ्येन (द्विषन्तम्) द्रुह्यन्तं विघ्नम् (विध्यति) छिनत्ति (इति)अनेन प्रकारेण (ब्रह्मवादिनः) परमात्मज्ञानिनः (वदन्ति) कथयन्ति ॥
