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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इमम्) इस [वैदिक] (सुगम्) सुख से चलने योग्य, (स्वस्तिवाहनम्) आनन्द पहुँचानेवाले (पन्थाम्) मार्गपर (आ अरुक्षाम) हम चढ़ें। (यस्मिन्) जिस [मार्ग] में (वीरः) वीर पुरुष (नरिष्यति) कष्ट नहीं पाता है, और (अन्येषाम्) दूसरे [अधर्मियों] का (वसु) धन [दण्ड द्वारा] (विन्दते) लेता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थियों को चाहियेकि धार्मिक वैदिक मार्ग पर चलकर वीरपन से अधर्मियों को दण्ड दें और धनवृद्धिकरें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(इमम्) प्रसिद्धं वैदिकम् (पन्थाम्) मार्गम् (आ अरुक्षाम) आरुहेम (सुगम्) सुखेन गमनीयम् (स्वस्तिवाहनम्) आनन्दप्रापकम् (यस्मिन्) पथि (वीरः)पराक्रमी पुरुषः (न) निषेधे (रिष्यति) दुःखं प्राप्नोति (अन्येषाम्) अधर्मिणाम् (विन्दते) लभते (वसु) धनम् ॥
