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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (वधूदर्शाः)वधू के देखनेवाले (पितरः) पिता आदि लोग (इमम्) इस (वहतुम्) विवाह उत्सव में (आअगमन्) आये हैं। (ते) वे सब (सम्पत्न्यै) पतिसहित वर्तमान (अस्यै वध्वै) इस वधूको (प्रजावत्) प्रजा [सन्तान, सेवक आदि जनता] वाला (शर्म) शुख (यच्छन्तु) देवें॥७३॥
भावार्थभाषाः - हितैषी बड़े लोगों काकर्तव्य है कि विद्वान् बलवान् वधूवर से विद्वान्, शूर, वीर सन्तान उत्पन्नहोवें ॥७३॥
टिप्पणी: ७३−(ये) (पितरः) पित्रादयः (वधूदर्शाः) दृशिर् दर्शने-अण्। वधूदर्शकाः (इमम्) दृश्यमानम् (वहतुम्) विवाहोत्सवम् (आ अगमन्) आगताः (ते) पूर्वोक्ताः (अस्यै) विदुष्यै (वध्वै) (सम्पत्न्यै) पत्या सह वर्तमानायै (प्रजावत्)सन्तानसेवकादियुक्तम् (यच्छन्तु) ददतु ॥
