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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्रवः) उद्योगी, (सुदानवः) बड़े दानी लोग (नौ) हम दोनों के लिये (जनियन्ति) जनों [भक्तजनों] कोचाहते हैं और (पुत्रियन्ति) पुत्रों को चाहते हैं। (अरिष्टासू) बिना नाश कियेहुए प्राणोंवाले [सदा पुरुषार्थी] हम दोनों (बृहते) बड़े (वाजसातये) विज्ञान, बल और अन्न के दान के लिये (सचेवहि) सदा मिले रहें ॥७२॥
भावार्थभाषाः - सब इष्ट मित्र यथावत्पुरुषार्थ से धन का व्यय करके चाहते हैं कि उनके पुत्रों के उत्तम सन्तानउत्पन्न हों, इसलिये पुत्र और पतोहू प्रीतिपूर्वक उपाय करें कि उत्तम सन्तानहोने से उनको विज्ञान, बल और अन्न आदि धन बढ़ें ॥७२॥यह मन्त्र महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात है। इसका पूर्वार्द्ध कुछ भेद सेऋग्वेद में है−७।९६।४ ॥
टिप्पणी: ७२−(जनियन्ति) सुप आत्मनः क्यच्। पा० ३।१।८। जन-क्यच्।अपुत्रादीनामिति वक्तव्यम्। वा० पा० ७।४।३५। इति प्राप्तस्य ईत्वस्य छान्दसोह्रस्वः। जनीयन्ति जनान् भक्तजनान् इच्छन्ति (नौ) आवाभ्याम् (अग्रवः)रुशातिभ्यां क्रुन्। उ० ४।१०३। अग गतौ−क्रुन्। गन्तारः। उद्योगिनः (पुत्रियन्ति) पुत्र-क्यचि, ईत्वस्य छान्दसो ह्रस्वः। पुत्रीयन्ति। पुत्रान्इच्छन्ति (सुदानवः) सुदानिनः (अरिष्टासू) रिष हिंसायाम्-क्त। अहिंसितप्राणौ।महापुरुषार्थिनौ (सचेवहि) षच समवाये विधिलिङ्। नित्यसम्बन्धिनौ भवेम (बृहते)महते (वाजसातये) वाजानां विज्ञानबलान्नानां दानाय ॥
