अमो॒ऽहम॑स्मि॒सा त्वं॒ सामा॒हम॒स्म्यृक्त्वं द्यौर॒हं पृ॑थि॒वी त्व॑म्। तावि॒ह सं भ॑वावप्र॒जामा ज॑नयावहै ॥
पद पाठ
अम: । अहम् । अस्मि । सा । त्वम् । साम । अहम् । अस्मि । ऋक् । त्वम् । द्यौ: । अहम् । पृथिवी । त्वम् । तौ । इह । सम् । भवाव । प्रऽजाम् । आ । जनयावहै ॥२.७१॥
अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:71
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे वधू !] (अहम्) मैं [वर] (अमः) ज्ञानवान् (अस्मि) हूँ, (सा) सो (त्वम्) तू [ज्ञानवती है], (अहम्)मैं (साम) सामवेद [मोक्षज्ञान के समान सुखदायक] (अस्मि) हूँ, (त्वम्) तू (ऋक्)ऋग्वेद की ऋचा [पदार्थों के गुणों की बड़ाई बतानेवाली विद्या के तुल्य आनन्ददेनेवाली] है, (अहम्) मैं (द्यौः) सूर्य [वृष्टि आदि करनेवाले रवि के समानउपकारी] हूँ, और (त्वम्) तू (पृथिवी) पृथिवी [अन्न आदि उत्पन्न करनेवाली भूमि केसमान उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेवाली] है। (तौ) वे हम दोनों (इह) यहाँ [गृहाश्रममें] (सं भवाव) पराक्रमी होवें, और (प्रजाम्) प्रजा [उत्तम सन्तान] को (आजनयावहै) उत्पन्न करें ॥७१॥
भावार्थभाषाः - वधू-वर राज्यप्रबन्धसे सन्तुष्ट होकर और अनेक प्रकार की विद्या और सम्पत्ति की प्राप्ति और सुसन्तानकी उत्पत्ति से सुखी होवें ॥७१॥यह मन्त्र कुछ भेद से महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में वधू-वर के परस्पर प्रतिज्ञा करने में व्याख्यात है॥
टिप्पणी: ७१−(अमः) अम गतौ भोजने च-असुन्, मतुपो लोपः। ज्ञानवान् (अहम्) (अस्मि) (सा)तादृशी ज्ञानवती (त्वम्) (साम) सामवेदेन मोक्षज्ञानेन तुल्यः सुखदायकः (अहम्) (अस्मि) (ऋक्) ऋग्वेदस्य वाणी। पदार्थगुणप्रकाशिकाविद्यावत् सुखप्रदा (त्वम्) (द्यौः) सूर्यतुल्यवृष्ट्यादिनोपकारकः (अहम्) (पृथिवी) अन्नोत्पादयित्री भूमिरिवसुसन्तानोत्पादयित्री (त्वम्) (तौ) आवां वधूवरौ (इह) गृहाश्रमे (सं भवाव)पराक्रमिणौ भवाव (प्रजाम्) सन्तानम् (आ जनयावहै) उत्पादयावहै ॥
