सं त्वा॑नह्यामि॒ पय॑सा पृथि॒व्याः सं त्वा॑ नह्यामि॒ पय॒सौष॑धीनाम्। सं त्वा॑ नह्यामिप्र॒जया॒ धने॑न॒ सा संन॑द्धा सनुहि॒ वाज॒मेमम् ॥
पद पाठ
सम् । त्वा । नह्यामि । पयस । पृथिव्या: । सम् । त्वा । नह्यामि । पयसा । ओषधीनाम । सम् । त्वा । नह्यामि । प्रऽजया । धनेन । सा । सम्ऽनध्दा । सनुहि । वाजम् । आ । इमम् ॥२.७०॥
अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:70
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे प्रजा !] (त्वा)तुझे (पृथिव्याः) पृथिवी के (पयसा) ज्ञान से (सं नह्यामि) मैं कवचधारी करता हूँ, (त्वा) तुझे (ओषधीनाम्) ओषधियों [अन्न सोमलता आदि] के (पयसा) ज्ञान से (संनह्यामि) कवचधारी करता हूँ। (त्वा) तुझे (प्रजया) प्रजा [सन्तान सेवक आदि] से और (धनेन) धन से (सं नह्यामि) मैं कटिबद्ध करता हूँ, (सा) सो तू [हे प्रजा !] (सन्नद्धा) सन्नद्ध [कटिबद्ध] होकर (इमम्) यह (वाजम्) बल (आ) सब ओर से (सनुहि)दे ॥७०॥
भावार्थभाषाः - राजा को योग्य है ऐसे-ऐसे विद्यालयों को बनावे, जिन में प्रजागण भूगर्भविद्या, भूतलविद्या, अन्नविद्या, ओषधिविद्या आदि प्राप्त करके सन्तान और धन से बढ़ती करें और राजा कोभी यथायोग्य सहायता देकर समर्थ बनावें ॥७०॥
टिप्पणी: ७०−(त्वा) त्वां प्रजाम् (संनह्यामि) सन्नद्धां धृतकवचां कटिबद्धां करोमि (पयसा) पय गतौ-असुन्। ज्ञानेन (पृथिव्याः) (त्वा) (सं नह्यामि) (पयसा) (ओषधीनाम्) अन्नसोमलतादीनाम् (त्वा) (संनह्यामि) (प्रजया) सन्तानसेवकादिना (धनेन) सम्पत्त्या (सा) सा त्वं प्रजे (सन्नद्धा) कटिबद्धा सती (सनुहि) षणु दाने। देहि (वाजम्) बलम्-निघ० २।९। (आ)समन्तात् (इमम्) प्रसिद्धम् ॥
