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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जो (ओषधयः)ओषधियाँ [अन्न, सोमलता आदि], (याः) जो (नद्यः) नदियाँ, (यानि) जो (क्षेत्राणि)खेत और (या) जो (वना) वन [वृक्ष वाटिका आदि] हैं। (ताः) वे सब [ओषधि आदि], (वधु)हे वधू ! (त्वा प्रजावतीम्) तुझ श्रेष्ठ सन्तानवाली को (पत्ये) पति के लिये (रक्षसः) राक्षस [विघ्न] से (रक्षन्तु) बचावें ॥७॥
भावार्थभाषाः - गृहाश्रमी स्त्री-पुरुषों को योग्य है कि अन्न, ओषधि, नदियों, वन, उपवन आदि आवश्यक पदार्थों कायथावत् उपयोग करके कष्टों से बचकर सुखी रहें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(याः) (ओषधयः) अन्नसोमलतादयः (याः) (नद्यः) (यानि) (क्षेत्राणि) अन्नोत्पत्तिस्थानानि (या) यानि (वना) वनानि।वनोपवनवाटिकादीनि (ताः) पूर्वोक्ता ओषध्यादयः (त्वा) (वधु) हे पत्नि (प्रजावतीम्) उत्तमसन्तानयुक्ताम् (पत्ये) स्वामिहिताय (रक्षन्तु) पालयन्तु (रक्षसः) रक्षणीयं यस्मात् तस्माद् राक्षसात् विघ्नात् ॥
