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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (संभले=संभलस्य) आपसमें समझा देनेवाले पुरुष के (कम्बले) कामनायोग्य कर्म पर (मलम्) मलिनता और (दुरितम्) खोट को (सादयित्वा) मिटा कर (वयम्) हम (यज्ञियाः) पूजायोग्य और (शुद्धाः) शुद्ध (अभूम) होवें, [और यह कर्म] (नः) हमारे (आयूंषि) जीवनों को (प्रतारिषत्) बढ़ावे ॥६७॥
भावार्थभाषाः - चतुर विद्वान् पुरुषके निर्णय पर परस्पर ग्लानि मिटाकर वधू-वर के पक्षवाले प्रसन्न होवें॥६७॥
टिप्पणी: ६७−(संभले) म० ६६। षष्ठ्यर्थे सप्तमी। सम्यग् निरूपकस्य (मलम्) मालिन्यम् (सादयित्वा) नाशयित्वा (कम्बले) म० ६६। कमनीये कर्मणि (दुरितम्) दोषम् (वयम्)पुरुषाः (अभूम) भवेम (यज्ञियाः) पूजार्हाः (शुद्धाः) प्रसन्नाः (प्र तारिषत्)वर्धयेत् (नः) अस्माकम् (आयूंषि) जीवनानि ॥
