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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हेपरमैश्वर्ययुक्त राजन् ! (इह) यहाँ [संसार में] (इमौ) इन दोनों (चक्रवाका इव)चकवा-चकवी के समान (दम्पती) पति-पत्नी को (सं नुद) यथावत् प्रेरणा कर (प्रजया)प्रजा के साथ (एनौ) इन दोनों (स्वस्तकौ) उत्तम घरवालों को (विश्वम्) सम्पूर्ण (आयः) आयु (वि अश्नुताम्) प्राप्त होवे ॥६४॥
भावार्थभाषाः - राजा व्यवस्था करे किपति-पत्नी चकवा-चकवी के समान बड़े प्रेम से मिलकर रहें और ब्रह्मचर्य के पालन औरधनादि के रक्षण से बलवान् और सुखी होकर पूर्ण आयु भोगें ॥६४॥यह मन्त्र महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात है ॥
टिप्पणी: ६४−(इह) संसारे (इमौ)प्रसिद्धौ (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (सं नुद) सम्यक् प्रेरय (चक्रवाका-इव) स्वनामख्यातौ खगौ यथा (दम्पती) जायापती (प्रजया) सन्तानेन (एनौ)द्वितीयाटौस्वेनः। पा० २।४।३४। इति द्वितीयायाम् एनादेशः। पूर्वोक्तौ (स्वस्तकौ)अस्तं गृहनाम-निघ० ३।४। उत्तमगृहयुक्तौ (विश्वम्) सम्पूर्णम् (आयुः) जीवनम् (अश्नुताम्) प्राप्नोतु ॥
