0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इयम्) यह (नारी) नारी [नर की पत्नी] (पूल्यानि) संगति के कर्मों को [बीजसमान] (आवपन्तिका) बोदेतीहुई (उप ब्रूते) बोलती है−“(मे) मेरा (पतिः) पति (दीर्घायुः) लम्बी आयुवाला (अस्तु) होवे, और (शतं शरदः) सौ वर्षों (जीवाति) जीता रहे ॥६३॥
भावार्थभाषाः - पत्नी प्रयत्न करकेपरमात्मा की प्रार्थना करे कि उस का पति सुख से पूर्ण आयु भोगे और इसी प्रकारपति भी पत्नी की पूर्ण आयु के लिये पुरुषार्थ करे ॥६३॥
टिप्पणी: ६३−(इयम्) (नारी) नरस्यपत्नी (उपब्रूते) कथयति (पूल्यानि) पूल संहतौ-क्यप्। संहतिकर्माणि। संगतिबीजानि (आवपन्तिका) टुवप बीजतन्तुसन्ताने-शतृ, स्वार्थे कन्, टाप् बीजवद् विस्तारयन्ती (दीर्घायुः) दीर्घजीवनः (अस्तु) (पतिः) (जीवाति) जीवेत् (शरदः) वर्षाणि (शतम्)बहूनि ॥
