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सा म॑न्दसा॒नामन॑सा शि॒वेन॑ र॒यिं धे॑हि॒ सर्व॑वीरं वच॒स्यम्। सु॒गं ती॒र्थं सु॑प्रपा॒णंशु॑भस्पती स्था॒णुं प॑थि॒ष्ठामप॑ दुर्म॒तिं ह॑तम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सा । मन्दसाना । मनसा । शिवेन । रयिम् । धेहि । सर्वऽवीरम् । वचस्यम् । सुऽगम् । तीर्थम् । सुऽप्रपानम् । शुभ: । पती इति । स्थाणुम् । पथिऽस्थाम् । अप । दु:ऽमतिम् । हतम् ॥२.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गृहआश्रम का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे वधू !] (सा) सो तू (मन्दसाना) आनन्द करती हुई, (शिवेन) कल्याणयुक्त (मनसा) मन के साथ (सर्ववीरम्)सब वीरोंवाले (वचस्यम्) स्तुतियोग्य (रयिम्) धन को (धेहि) धारण कर। (शुभः पती)हे शुभ क्रिया के रक्षक तुम दोनों ! (सुगम्) सुख से जाने योग्य, (सुप्रपाणम्)सुन्दर पानीवाले (तीर्थम्) तीर्थ [उतरने के घाट] को [धारण करो]और (पथिष्ठाम्)मार्ग में खड़े हुए (स्थाणुम्) ठूठ [झाड़ झंकड़ आदि समान] (दुर्मतिम्) दुर्मतिको (अप हतम्) नाश करो ॥६॥
भावार्थभाषाः - जहाँ पर गुणवती स्त्रीप्रसन्न होकर धन का प्रबन्ध करके सन्तानों को शूर, वीर, यशस्वी बनाती है, वहाँपर दोनों पति-पत्नी विघ्नों को हटाकर गृहाश्रम को ऐसा सुखदायी करते हैं, जैसेविद्वान् शिल्पी मार्ग के कण्टक आदि मेंटकर नदी का सुगम तीर्थ अर्थात् घाट बनाताहै, जिस पर होकर सब सुख से उतरते और जल से स्नान-पान करके आनन्द पाते हैं ॥६॥यहमन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।४०।१३ ॥
टिप्पणी: ६−(सा) सा त्वम् (मन्दसाना)ऋञ्जिवृधिमन्दिसहिभ्यः कित्। उ० २।८७। मदि आमोदस्तुतिदीप्त्यादिषु-असानच् कित्।आमोदयित्री (मनसा) चित्तेन (शिवेन) कल्याणयुक्तेन (रयिम्) धनम् (धेहि) धारय (सर्ववीरम्) सर्ववीरोपेतम् (वचस्यम्) प्रशंसनीयम् (सुगम्) सुखेन गन्तव्यम् (तीर्थम्) पातॄतुदिवचि०। उ० २।७। तॄ प्लवनतरणयोः-थक्। तरणस्थानम् (सुप्रपाणम्)स्वच्छप्रकृष्टपानयुक्तम् (शुभः पती) हे शुभक्रियायाः पालकौ (स्थाणुम्)शाखाशून्यवृक्षादिकम् (पथिष्ठाम्) मार्गस्थम् (दुर्मतिम्) कुबुद्धिम् (अप हतम्)दूरे नाशयतम् ॥