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बृह॒स्पति॒नाव॑सृष्टां॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑धारयन्। रसो॒ गोषु॒ प्रवि॑ष्टो॒यस्तेने॒मां सं सृ॑जामसि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बृहस्पतिना । अवऽसृष्टाम् । विश्वे । देवा: । अधारयन् । रस: । गोषु । प्रऽविष्ट: । य: । तेन । इमाम् । सम् । सृजामसि । इमाम् । सम् । सृजामसि ॥२.५८॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:58


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गृहआश्रम का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिना) बृहस्पति [बड़ी वेदवाणी के रक्षक आचार्य] करके (अवसृष्टाम्) दी हुई [दीक्षा, नियम व्रतकी शिक्षा-म० ५२] को (विश्वे देवाः) सब विद्वानों ने (अधारयन्) धारण किया है। (यः) जो (रसः) रस [वीर्य वा वीर रस] (गोषु) विद्वानों में (प्रविष्टः) प्रविष्टहै, (तेन) उससे (इमाम्) इस [प्रजा, स्त्री सन्तान आदि] को (सं सृजामसि) हमसंयुक्त करते हैं ॥५८॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य पूर्वजविद्वानों के समान अपने लोगों को सुशिक्षित करके वीर बनाते हैं, वे सुप्रतिष्ठितहो कर सुख भोगते हैं ॥५८॥
टिप्पणी: ५८−(रसः) वीर्यम्। वीररसः। अन्यद् गतम् ॥