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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिना) बृहस्पति [बड़ी वेदवाणी के रक्षक आचार्य] करके (अवसृष्टाम्) दी हुई [दीक्षा, नियम व्रतकी शिक्षा-मन्त्र ५२] को (विश्वे देवाः) सब विद्वानों ने (अधारयन्) धारण कियाहै। (यत्) जो (वर्चः) प्रताप (गोषु) विद्वानों में (प्रविष्टम्) प्रविष्ट है, (तेन) उससे (इमाम्) इस [प्रजा, स्त्री सन्तान आदि] को (सं सृजामसि) हम संयुक्तकरते हैं ॥५३॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार आचार्य सेसुशिक्षा पाकर पूर्वज विद्वानों ने उत्तम पद पाये हैं, वैसे ही मनुष्य अपनेलोगों को सुशिक्षा देकर उन्नत करें ॥५३॥
टिप्पणी: ५३−(बृहस्पतिना) बृहत्या वेदवाण्यारक्षकेण। आचार्येण (अवसृष्टाम्) दत्ताम्, दीक्षाम्-इति पदस्यपूर्वमन्त्रादनुवृत्तिः (विश्वे) सर्वे (देवाः) विद्वांसः (अधारयन्) धारितवन्तः (वर्चः) प्रतापः (गोषु) गच्छति जानातीति गौः। गौः स्तोतृनाम-निघ० ३।१६।विद्वत्सु (प्रविष्टम्) व्याप्तम् (यत्) (तेन) (इमाम्) दृश्यमानां प्रजाम् (संसृजामसि) वयं संयोजयामः ॥
