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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इमाः) यह (उशतीः)कामना करती हुईं (कन्यलाः) शोभावती कन्याएँ (पितृलोकात्) पितृलोक [पितृकुल] से (पतिम्) अपने-अपने पति को (यतीः) जाती हुईं (स्वाहा) सुन्दर वाणी के साथ (दीक्षाम्) दीक्षा [नियम व्रत की शिक्षा] को (अव सृक्षत) दान करें ॥५२॥
भावार्थभाषाः - गुणवती विदुषीस्त्रियाँ विवाह करके घर के सुप्रबन्ध से सन्तान आदि को वेद द्वारा उत्तम नियमऔर कर्म सिखावें ॥५२॥
टिप्पणी: ५२−(उशतीः) कामयमानाः (कन्यलाः) अ० ५।५।३। अघ्न्यादयश्च। उ०४।११२। कनी दीप्तिकान्तिगतिषु-यक्+ला आदाने-क, टाप्। शोभाग्रहीत्र्यः (इमाः)विदुष्यः (पितृलोकात्) पितृकुलात् (पतिम्) स्वस्वभर्तारम् (यतीः) गच्छन्त्यः (दीक्षाम्) दीक्ष मौण्ड्येज्योपनयननियमव्रतादेशेषु-अप्रत्ययः। नियमव्रतयोःशिक्षाम् (अव सृक्षत) अवसृजन्तु। ददतु (स्वाहा) अ० २।१६।१। सुवाण्या। वेदवाचा ॥
