पदार्थान्वयभाषाः - (वाजिनीवसू) हे बहुतवेगवाली वा अन्नवाली क्रियाओं में निवास करनेवाले दोनों [स्त्री-पुरुषो !] (वाम्) तुम दोनों को (सुमतिः) सुमति (आ) सब ओर से (अगन्) प्राप्त होवे, (अश्विना) हे विद्या को प्राप्त दोनों (हृत्सु) [तुम्हारे] हृदयों में (कामाः)शुभ कामनाएँ (नि) निरन्तर (अरंसत) रमण करें [रहें]। (शुभः पती) हे शुभ क्रियाके रक्षको ! (मिथुना) तुम दोनों (गोपा) रक्षक (अभूतम्) होओ, (प्रियाः) हम लोगप्रिय होकर (अर्यम्णः) श्रेष्ठों के मान करनेवाले पुरुष के (दुर्यान्) घरों को (अशीमहि) प्राप्त करें ॥५॥
भावार्थभाषाः - स्त्री-पुरुषों कोचाहिये कि फुरती से सुमतिपूर्वक अन्न आदि सामग्री प्राप्त करके शुभ कामनाएँ सिद्ध करते हुए सबके रक्षक बनें, जिस से विद्वान् लोग प्रीति करके उनका आश्रयलेवें ॥५॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।४०।१२ ॥