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शुम्भ॑नी॒द्यावा॑पृथि॒वी अन्ति॑सुम्ने॒ महि॑व्रते। आपः॑ स॒प्त सु॑स्रुवुर्दे॒वीस्ता नो॑मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शुम्भनी इति । द्यावापृथिवी इति । अन्तिसुम्ने इत्यन्तिऽसुम्ने । महिव्रते इति महिऽव्रते । आप: । सप्त । सुस्रुव: । देवी: । ता: । न: । मुञ्चन्तु अंहस: ॥२.४५॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:45


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गृहआश्रम का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (शुम्भनी) शोभायमान (द्यावापृथिवी) सूर्य और पृथिवीलोक (अन्तिसुम्ने) [अपनी] गतियों से सुखदेनेवाले और (महिव्रते) बड़े व्रत [नियम] वाले हैं। (देवीः) उत्तम गुणवाली (सप्त) सात (आपः) व्यापनशील इन्द्रियाँ [दो कान, दो नथने, दो आँखें और एक मुख] (सुस्रुवुः) [हमें] प्राप्त हुई हैं, (ताः) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥४५॥
भावार्थभाषाः - जैसे सूर्य औरपृथिवीलोक ईश्वरनियम से अपनी-अपनी गति पर चलकर वृष्टि अन्न आदि से उपकार करतेहैं, वैसे ही मनुष्य इन्द्रियों को नियम में रखकर अपराधों से बचें ॥४५॥यह मन्त्रऊपर आ चुका है-अ० ७।११२।१ ॥
टिप्पणी: ४५−अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ७।११२।१ ॥