स्यो॒नाद्योने॒रधि॒ बुध्य॑मानौ हसामु॒दौ मह॑सा॒ मोद॑मानौ। सु॒गू सु॑पु॒त्रौसु॑गृ॒हौ त॑राथो जी॒वावु॒षसो॑ विभा॒तीः ॥
पद पाठ
स्योनात् । योने: । अधि । बुध्यमानौ । हसामुदौ । महसा । मोदमानौ । सुगू इति सुऽगू । सुऽपुत्रौ । सुऽगृहौ । तराथ: । जीवौ । उषस: । विऽभाती: ॥२.४३॥
अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:43
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे स्त्री-पुरुषो !] (स्योनात्) सुखदायक (योनेः) घर से (अधि) अच्छे प्रकार (बुध्यमानौ) जागते हुए, (हसामुदौ) हँसी और आनन्द करते हुए (महसा) बड़े प्रेम से (मोदमानौ) हर्ष मनातेहुए, (सुगू) सुन्दर चाल चलनेवाले [वा उत्तम गौओंवाले] (सुपुत्रौ) श्रेष्ठपुत्रोंवाले, (सुगृहौ) श्रेष्ठ गृह सामग्रीवाले, (जीवौ) प्राणों को धारण करतेहुए तुम दोनों (विभातीः) सुन्दर प्रकाशयुक्त (उषसः) बहुत प्रभातवेलाओं को (तराथः) पार करो ॥४३॥
भावार्थभाषाः - स्त्री-पुरुषों कोउचित है कि अपने घरों को आवश्यक गृहसामग्रियों से भरपूर रक्खें और पुत्र-पौत्रआदि के साथ प्रसन्न रहकर चिरजीवी होकर यशस्वी होवें ॥४३॥यह मन्त्र महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात है ॥
टिप्पणी: ४३−(स्योनात्)सुखप्रदात् (योनेः) गृहात्-निघ० ३।४ (अधि) यथाविधि (बुध्यमानौ) जागरूकौ।अप्रमत्तौ (हसामुदौ) हास्येनामोदं कुर्वन्तौ (महसा) महता प्रेम्णा (मोदमानौ)हर्षन्तौ (सुगू) सु+गच्छतेर्डु, यद्वा। गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य। पा० १।२।४८। इतिगोर्ह्रस्वः। शोभनचरित्रौ। उत्तमगोयुक्तौ (सुपुत्रौ) श्रेष्ठसन्तानौ (सुगृहौ)श्रेष्ठगृहसामग्रीयुक्तौ (तराथः) पारयतम् (जीवौ) प्राणान् धारयन्तौ (उषसः)बहुप्रभातवेलाः (विभातीः) विविधप्रकाशमानाः ॥
