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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - १−सामान्य अर्थ ॥(सोमः) सोम [शान्ति आदि शुभ गुण] (गन्धर्वाय) गन्धर्व [वेदवाणी के धारण करनेवालेगुण] के लिये [कन्या को] (ददत्) देता है, (गन्धर्वः) गन्धर्व [वेदवाणी के धारणकरनेवाला गुण] (अग्नये) अग्नि [विद्या और शरीर के तेज] के लिये (ददत्) देता है। (अथो) फिर (अग्निः) अग्नि [विद्या और शरीर का तेज] (इमाम्) इस [स्त्री] को (च)और (रयिम्) धन को, (च) और (पुत्रान्) पुत्रों को (मह्यम्) मुझ [युवा ब्रह्मचारी]को (अदात्) देता है ॥४॥ २−नियोगविषयक अर्थ ॥ (सोमः) सोम [ऐश्वर्यवान् विवाहित पति] (गन्धर्वाय) गन्धर्व [वेदवाणी के धारण करनेवाले दूसरेनियुक्त पुरुष] के लिये [स्त्री को] (ददत्) छोड़ता है। (गन्धर्वः) गन्धर्व [वेदवाणी का धारण करनेवाला दूसरा नियुक्त पुरुष] (अग्नये) अग्नि [ज्ञानी तीसरेनियुक्त पुरुष] के लिये (ददत्) छोड़ता है। (अथो) फिर (अग्निः) अग्नि [ज्ञानीतीसरा नियुक्त पुरुष] (इमाम्) इस [स्त्री] को, (च) और (रयिम्) धन को (च) और (पुत्रान्) पुत्रों को (मह्यम्) मेरे लिये [अर्थात् चौथे नियुक्त पुरुष के लिये] (अदात्) छोड़ता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - जब कन्या माता-पिता औरआचार्या से यथाक्रम सुशिक्षित होकर युवती हो जावे, तब यथाक्रम माता-पिता औरआचार्य से शिक्षा पाया हुआ युवा ब्रह्मचारी वैसी गुणवती कन्या से विवाह करकेधनवान् और पुत्रवान् होवे ॥४॥ मनुष्य को योग्य है कि सदा एकस्त्रीव्रत रहे, चाहे वहविवाहित हो वा नियुक्त हो, और विवाहित स्त्री के मर जाने वा रोगी हो जाने पर आपत्काल में ही एक-दूसरे के पीछे अन्य तीन स्त्रियों तक नियोग करके धन और सन्तानप्राप्त करे। इसी प्रकार स्त्री भी एक विवाहित पति के मर जाने वा रोगी हो जाने परआपत्काल में ही अन्य तीन नियुक्त पतियों के साथ एक-दूसरे के पीछे रह कर धन औरसन्तान की रक्षा करे ॥४॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१०।८५।४१ ॥
टिप्पणी: ४−(सोमः) शान्त्यादिगुणः। ऐश्वर्यवान्विवाहितपुरुषः (ददत्) दद दाने त्यागे च। ददाति। त्यजति कन्यां स्त्रियं वेतिशेषः (गन्धर्वाय) वेदवाणीधारकाय गुणाय नियुक्तपुरुषाय वा (गन्धर्वः) (ददत्) (अग्नये) विद्याप्राप्तिशरीरपुष्टिजन्यतेजसे। ज्ञानवते तृतीयनियुक्तपुरुषाय (रयिम्) धनम् (च) (पुत्रान्) (च) (अदात्) ददाति। त्यजति (अग्निः) ज्ञानवान्तृतीयनियुक्तपुरुषः (मह्यम्) यूने ब्रह्मचारिणे। चतुर्थनियुक्तपुरुषाय (अथो)पुनः (इमाम्) स्त्रियम् ॥
