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दे॒वा अ॑ग्रे॒न्यपद्यन्त॒ पत्नीः॒ सम॑स्पृशन्त त॒न्वस्त॒नूभिः॑। सू॒र्येव॑ नारिवि॒श्वरू॑पा महि॒त्वा प्र॒जाव॑ती॒ पत्या॒ सं भ॑वे॒ह ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

देवा: । अग्रे । नि । अपद्यन्त । पत्नी: । सम् । अस्पृशन्त । तन्व: । तनूभि: । सूर्याऽइव । नारि । विश्वऽरूपा । महिऽत्वा । प्रजाऽवती । पत्या । सम् । भव । इह ॥२.३२॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:32


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गृहआश्रम का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) विद्वान् लोग (अग्रे) पहिले (पत्नीः) अपनी पत्नियों को (नि) निश्चय करके (अपद्यन्त) प्राप्तहुए हैं, और उन्होंने (तन्वः) शरीरों को (तनूभिः) शरीरों से (सम्) यथाविधि (अस्पृशन्त) स्पर्श किया है। [वैसे ही] (नारी) हे नारी ! तू (सूर्या इव) सूर्यकी कान्ति के समान (महित्वा) अपने महत्त्व से (विश्वरूपा) समस्त सुन्दरतावाली, (प्रजावती) उत्तम सन्तान को प्राप्त होनेहारी तू (पत्या) अपने पति से (इह) यहाँ [गृहाश्रम में] (सं भव) मिल ॥३२॥
भावार्थभाषाः - पूर्वज महात्माओं केसमान पति-पत्नी आपस में प्रीति से प्रयत्न करके उत्तम सन्तान उत्पन्न करें औरगृहाश्रम के बीच सुख बढ़ावें ॥३२॥मन्त्र ३१ की टिप्पणी देखो ॥
टिप्पणी: ३२−(देवाः)विद्वांसः (अग्रे) पूर्वकाले (नि) निश्चयेन (अपद्यन्त) प्राप्तवन्तः (पत्नीः) (सम्) सम्यक्। यथाविधि (अस्पृशन्त) स्पृष्टवन्तः (तन्वः) शरीराणि (तनूभिः)शरीरैः (सूर्या) सूर्यकान्तिः (इव) यथा (नारि) हे नरस्य पत्नि (विश्वरूपा)सर्वसौन्दर्योपेता (महित्वा) महत्त्वेन (प्रजावती) प्रशस्तसन्तानयुक्ता (पत्या) (सं भव) संगच्छस्व (इह) गृहाश्रमे ॥