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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे विद्वानो !] (इयम्वधूः) यह वधू (सुमङ्गलीः) बड़े मङ्गलवाली है, (समेत) मिलकर आओ और (इमाम्) इसे (पश्यत) देखो। (अस्यै) इस [वधू] को (सौभाग्यम्) सुभागपन [पति की प्रीति] (दत्त्वा) देकर (दौर्भाग्यैः) दुर्भागपनों से [इस को] (विपरेतन) पृथक् रक्खो॥२८॥
भावार्थभाषाः - सब विद्वान् लोग मिलकरआशीर्वाद देवें कि वधू पति की प्राणप्रिया होकर सदा आनन्द से रहे और कभी कष्ट नउठावे ॥२८॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८५।३३, और महर्षिदयानन्दकृतसंस्कारविधि विवाहप्रकरण में आशीर्वाद देने के लिये विवाह में आये लोगों केबुलाने में विनियुक्त है ॥
टिप्पणी: २८−(सुमङ्गलीः) छान्दसो विसर्गः। बहुमङ्गलवती (इयम्)दर्शनीया (वधूः) (इमाम्) (समेत) समेत्य आगच्छत (पश्यत) अवलोकयत (सौभाग्यम्)सुभगत्वम्। पतिप्रियत्वम्। बह्वैश्वर्यवत्वम् (अस्यै) (वध्वै) (दत्त्वा) (दौर्भाग्यैः)दुर्भगत्वैः। ऐश्वर्यराहित्यैः। पतिस्नेहशून्यकर्मभिः (विपरेतन)अन्तर्गतण्यर्थः। विपरागमयत। पृथक् कुरुत ताम् ॥
