0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रोहिते) रोहित [हरिणविशेष] के (चर्मणि अधि) चर्म पर (बल्बजम्) बल्बज [तृणविशेष का आसन] (उपस्तृणीहि) तू फैला। (तत्र) उस पर (सुप्रजाः) सुन्दर जन्मवाली वधू (उपविश्य)बैठकर (इमम्) इस (अग्निम्) अग्नि [व्यापक परमेश्वर वा भौतिक अग्नि] की (सपर्यतु)सेवा करे ॥२३॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों के दिये आसनपर बैठकर कुलवधू परमेश्वर की उपासना और यज्ञ आदि में अग्नि का प्रयोग करे॥२३॥
टिप्पणी: २३−(उप स्तृणीहि) आच्छादय (बल्बजम्) म० २२। तृणविशेषासनम् (अधि) उपरि (चर्मणि) म० २२। (रोहिते) रोहित-अर्शआद्यच्। मृगविशेषसम्बन्धिनि।गोकर्णपृषतैणर्श्यरोहिताश्चमरो मृगाः। अमर० १५।१०। (तत्र) आसने (उपविश्य) (सुप्रजाः) सुजन्मा वधू (इमम्) प्रसिद्धम् (अग्निम्) व्यापकं परमेश्वरंभौतिकाग्निं वा (सपर्यतु) परिचरतु ॥
