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यं बल्ब॑जं॒न्यस्य॑थ॒ चर्म॑ चोपस्तृणी॒थन॑। तदा रो॑हतु सुप्र॒जा या क॒न्या वि॒न्दते॒पति॑म् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यम् । बल्बजम् । निऽअस्यथ । चर्म । च । उपऽस्तृणीथन । तत् । आ । रोहतु । सुऽप्रजा: । या । कन्या । विन्दते । पतिम् ॥२.२२॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:22


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गृहआश्रम का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे विद्वानो !] (यम्)जिस (बल्बजम्) बल्बज [तृणविशेष के आसन] को (न्यस्यथ) तुम बिछाते हो (च) और (चर्म) [मृग सिंह आदि का चर्म, उस पर] (उपस्तृणीथन) तुम फैलाते हो। (सुप्रजाः)सुन्दर जन्मवाली (कन्या) वह कन्या [कमनीया वधू] (तत्) उस पर (आ रोहतु) ऊँचीबैठे, (या) जो (पतिम्) पति को (विन्दते) पाती है ॥२२॥
भावार्थभाषाः - घर के विद्वान् लोगयोग्य आसन आदि से पतिव्रता कुलवधू का आदर-सत्कार करते रहें ॥२२॥(बल्बज) एक तृणविशेष मूँज वा कुश का भेद है, जिससे मूँज न मिलने पर मेखला बनाने को मनु० २।४३। मेंलिखा है ॥
टिप्पणी: २२−(यम्) (बल्बजम्) अशूप्रुषिलटि–०। उ० १।१५१। बल संवरणेवेष्टने-क्वन्+जन-ड। बलते भुवं वेष्टयतीति बल्बः पर्वतस्तत्र जायते।तृणविशेषासनम्। मुञ्जभेदम्-यथा मनु० २।४३। (न्यस्यथ) निक्षिपथ (चर्म)सिंहमृगादिचर्म (च) (उपस्तृणीथन) आच्छादयथ (तत्) आसनम् (आ रोहतु) आतिष्ठतु (सुप्रजाः) जनी प्रादुर्भावे-विट्। सुजन्मा (या) (कन्या) कमनीया वधू (विन्दते)लभते (पतिम्) भर्तारम् ॥