पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निः) सर्वव्यापकपरमेश्वर ने (आयुषा) आयु और (वर्चसा सह) तेज के साथ (पत्नीम्) पत्नी को (पुनः)निश्चय करके (अदात्) दिया है। (अस्याः) इस [पत्नी] का (यः) जो (पतिः) पति है, [वह] (दीर्घायुः) दीर्घ आयुवाला होकर (शतम् शरदः) सौ वर्षों तक (जीवाति) जीतारहे ॥२॥
भावार्थभाषाः - जिस परमेश्वर केअनुग्रह से आयुष्मती पुण्यवती वधू प्राप्त हुई है, उस परमात्मा से बुद्धिमान्लोग प्रार्थना करें कि उसका पति भी यश और कीर्ति के साथ पूर्ण आयु भोगे ॥२॥यहमन्त्र ऋग्वेद में है−१०।८५।३९ ॥
टिप्पणी: २−(पुनः) निश्चयेन (पत्नीम्) (अग्निः)सर्वव्यापकः परमेश्वरः (अदात्) दत्तवान् (आयुषा) जीवनेन (सह) (वर्चसा) (दीर्घायुः) चिरंजीवी (अस्याः) पत्न्याः (यः) (पतिः) (जीवाति) जीवतु (शरदः)संवत्सरान् (शतम्) ॥
