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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे स्त्री-पुरुषो !] (वः) तुम्हारी (ऊर्मिः) उत्साहरूपी लहर (उत् हन्तु) ऊँची चले, (आपः) हे आप्तप्रजाओ ! (शम्याः) कर्मकुशल होकर तुम (योक्त्राणि) निन्दित कर्मों को (मुञ्चत)छोड़ो। (अदुष्कृतौ) दुष्ट आचरण न करनेवाले, (व्येनसौ) पापरहित, (अघ्न्यौ) नहींमारने योग्य [दोनों स्त्री-पुरुष] (अशुनम्) दुःख (मा आ अरताम्) कभी न पावें ॥१६॥
भावार्थभाषाः - सब कर्मकुशल स्त्री-पुरुष निन्दित कर्मों को छोड़कर शुभ कर्मों में अपना उत्साह बढ़ावें, जिन केअनुकरण से यह दम्पती पापों से मुक्त रहकर धर्मात्मा होते हुए उत्तम सन्तानों केसाथ सुख भोगें ॥१६॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−३।३३।१३ ॥
टिप्पणी: १६−(उत्) उपरि (वः) युष्माकम् (ऊर्मिः) ऋ गतौ-मि प्रत्ययः। उत्साहरूपतरङ्गः (शम्याः) कर्मनामनिघ० २।१। शमी-यत्। शमीषु कर्मसु कुशलाः (हन्तु) गच्छतु (आपः) हे आप्तप्रजाः (योक्त्राणि) युज निन्दायाम्−ष्ट्रन्प्रत्ययः, नित्स्वरः। निन्दितकर्माणि (मुञ्चत) त्यजत (मा) निषेधे (अदुष्कृतौ) अदुष्टकर्माणौ (व्येनसौ) विगतपापौ (अघ्न्यौ) हन्तुमनर्हौ स्त्रीपुरुषौ (अशुनम्) शुन गतौ-क। शुनं सुखनाम-निघ० ३।६।सुखरहितं दुःखम् (आ) समन्तात् (अरताम्) ऋ गतौ-लुङ्। प्राप्नुताम् ॥
