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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सरस्वति) हे सरस्वती ! [श्रेष्ठ विज्ञानवाली] (प्रति तिष्ठ) दृढ़ रह, (विष्णुः इव) व्यापक सूर्य केसमान तू (इह) यहाँ पर [गृहाश्रम में] (विराट्) विविध प्रकार ऐश्वर्यवाली (असि)है। (सिनीवालि) हे अन्नवाली पत्नी ! [तुझसे] (प्रजायताम्) उत्तम सन्तान उत्पन्नहोवे और वह [सन्तान] (भगस्य) भगवान् [ऐश्वर्यवान् परमात्मा] की (सुमतौ) सुमतिमें (असत्) रहे ॥१५॥
भावार्थभाषाः - गर्भवती स्त्रीविज्ञानपूर्वक समर्थ होकर वेदादि शास्त्रों के स्वाध्याय और बड़े-बड़े पुरुषोंके चरित्रों के विचार से श्रेष्ठ धर्मात्मा ईश्वरभक्त सन्तान उत्पन्न करे॥१५॥
टिप्पणी: १५−(प्रति तिष्ठ) दृढं वर्तस्व (विराट्) विविधैश्वर्यवती (असि) (विष्णुः)व्यापकः सूर्यः (इव) यथा (इह) अस्मिन् गृहाश्रमे (सरस्वति) हे श्रेष्ठविज्ञानवति (सिनीवालि) अ० २।२६।२। षिञ् बन्धने-नक्, ङीप्+बल संवरणे, यद्वा बल जीवने-दानेच-अण्, ङीप्। सिनीवाली सिनमन्नं भवति सिनाति भूतानि बालं पर्ववृणोतेस्तस्मिन्नन्नवती-निरु० ११।३१। हे अन्नवति पत्नि (प्र जायताम्)उत्तमसन्तान उत्पद्यताम् (भगस्य) ऐश्वर्यवतः परमेश्वरस्य (सुमतौ) धार्मिकबुद्धौ (असत्) भवेत् ॥
