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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहआश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (परिपन्थिनः)बटमार लोग (दम्पती) पति-पत्नी के (आसीदन्ति) घात में आकर बैठते हैं, (मा विदन्)वे न मिलें। (सुगेन) सुगम [मार्ग] से (दुर्गम्) कठिन स्थान को (अति) पार करके (इताम्) दोनों चले जावें और (अरातयः) शत्रु लोग (अप द्रान्तु) भाग जावें ॥११॥
भावार्थभाषाः - मार्ग चलने में स्त्री-पुरुष सावधानी से प्रबन्ध करलें कि डाकू लुटेरे आदि के उपद्रवों से बचकर कुशल सेठिकाने पर पहुँचे ॥११॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८५।३२, और महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में चोर आदि से भय वा भयङ्कर स्थान होने परबोलने के लिये उद्धृत है। इस मन्त्र का चौथा पाद ऊपर आ चुका है-अ० ६।१२९।१-३॥
टिप्पणी: ११−(मा विदन्) मा प्राप्नुवन्तु (परिपन्थिनः) अ० १।२७।२। प्रतिकूलाचारिणः (आसीदन्ति) आगत्य घाते तिष्ठन्ति (दम्पती) पतिपत्न्यौ (सुगेन) सुगमनीयेन मार्गेण (दुर्गम्) दुर्गम्यस्थानम् (अति) अतीत्य (इताम्) गच्छताम् (अ द्रान्तु)पलायन्ताम् (अरातयः) शत्रवः ॥
