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तुभ्य॒मग्रे॒पर्य॑वहन्त्सू॒र्यां व॑ह॒तुना॑ स॒ह। स नः॒ पति॑भ्यो जा॒यां दा अ॑ग्ने प्र॒जया॑स॒ह ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तुभ्यम् । अग्रे । परि । अवहन् । सूर्याम् । वहतुना । सह । स: । न: । पतिऽभ्य: । जायाम् । दा: । अग्ने । प्रऽजया । सह ॥२.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गृहआश्रम का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वज्ञपरमात्मन् ! (अग्रे) पहिले से वर्तमान (तुभ्यम्) तेरे लिये [तेरी आज्ञा पालन केलिये] (सूर्याम्) प्रेरणा करनेवाली [वा सूर्य की चमक के समान तेजवाली] कन्या को (वहतुना सह) दाय [यौतुक, अर्थात् विवाह में दिये हुए पदार्थ] के साथ (परि) सबप्रकार से (अवहन्) वे [विद्वान् लोग] लाये हैं, (सः) सो तू [हे परमेश्वर !] (नःपतिभ्यः) हम पतिकुलवालों के हित के लिये (जायाम्) इस पत्नी को (प्रजया सह) प्रजा [सन्तान सेवक आदि] के साथ (दाः) दे ॥१॥
भावार्थभाषाः - अनादि परमात्मा कीउपासना करके विद्वान् लोग गुणवती कन्या को यौतुक आदि के साथ पतिकुल में आनन्दसे रहने के लिये आशीर्वाद देवें ॥१॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८५।३८, और महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में वधू-वर केयज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करने में उद्धृत है ॥
टिप्पणी: १−(तुभ्यम्) तवाज्ञापालनाय (अग्रे)आदौ वर्तमानाय (परि) सर्वतः (अवहन्) प्रापितवन्त विद्वांसः (सूर्याम्)प्रेरयित्रीम्। सूर्यदीप्तिवत्तेजस्विनीं कन्याम् (वहतुना) विवाहकालेदेयपदार्थेन (सह) (सः) स त्वं परमेश्वरः (नः) अस्मभ्यम् (पतिभ्यः) पतिकुलस्थानांहिताय (जायाम्) पत्नीम् (दाः) देहि (अग्ने) अगि गतौ-नि, नलोपः। हे सर्वज्ञपरमात्मन् (प्रजया) सन्तानसेवकादिना (सह) ॥