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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) शुभगुणयुक्तब्रह्मचारी (वधूयुः) वधू की कामना करनेहारा (अभवत्) हो, (उभा) दोनों (अश्विना)विद्या को प्राप्त [वधू वर] (वरा) परस्पर चाहनेवाले [वा श्रेष्ठ गुणवाले] (आस्ताम्) हों, (यत्) जब (पत्ये) पति के लिये (मनसा) मनसे (संशन्तीम्) गुणकीर्तन करती हुई (सूर्याम्) प्रेरणा करनेवाली [वा सूर्य की चमक के समानतेजवाली] कन्या को (सविता) जगत् का उत्पादक परमात्मा (अददात्) देवे ॥९॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मचारी औरब्रह्मचारिणी पूर्ण विद्या प्राप्त करके परस्पर गुणों की परीक्षा करके कराकेगृहाश्रम में प्रवेश करें और परमेश्वर को धन्यवाद दें कि बड़े भाग्य से तुल्यगुण कर्म स्वभाववाले स्त्री-पुरुषों का जोड़ा मिलता है ॥९॥यह मन्त्र महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात है ॥
टिप्पणी: ९−(सोमः)शुभगुणयुक्तो ब्रह्मचारी (वधूयुः) सुप आत्मनः क्यच्। पा० ३।१।८। वधू-क्यच्।क्याच्छन्दसि। पा० ३।२।१७०। उ प्रत्ययः। वधूकामः (अभवत्) भवेत् (अश्विना) म० ८।परस्परेच्छुकौ। श्रेष्ठौ (सूर्याम्) प्रेरयित्रीम्। तेजस्विनीं कन्याम् (यत्)यदा (पत्ये) स्वाम्यर्थम् (संशन्तीम्) गुणकीर्तनं कुर्वतीम् (मनसा) हृदयेन (सविता) सर्वोत्पादकः परमेश्वरः (अददात्) दद्यात् ॥
