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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रैभी) वेदवाणी (सूर्यायाः) प्रेरणा करनेवाली [वा सूर्य की चमक के समान तेजवाली] कन्या की (अनुदेयी) साथिन [समान] और (नाराशंसी) मनुष्यों के गुणों की स्तुति (न्योचनी)नौची [छोटी सहेली समान] (आसीत्) हो। और (भद्रम्) शुभ कर्म (इत्) ही (वासः)वस्त्र [समान] हो [क्योंकि वह] (गाथया) गाने योग्य वेदविद्या से (परिष्कृता)सजी हुई (एति) चलती है ॥७॥
भावार्थभाषाः - कन्या वेदों औरइतिहासों को पढ़कर विचारकर शुभ कर्म करती हुई उत्तम विद्या से अपनी शोभा बढ़ावे॥७॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८५।६ ॥
टिप्पणी: ७−(रैभी) रेभ-अण्, ङीप्। रेभःस्तोतृनाम-निघ० ३।१६। रेभस्य स्तोतुरियम्। वेदवाणी (आसीत्) स्यात् (अनुदेयी)अनुदीयमानावयस्या (नाराशंसी) नर+शंसु स्तुतौ-अण्। अन्येषामपि दृश्यते। पा०६।३।१३७। इति दीर्घः। ततः प्रज्ञादित्वात् स्वार्थिकोऽण्, नराशंस एव नाराशंसः।येन नराः प्रशस्यन्ते स नराशंसो मन्त्रः-निरु० ९।९। स्त्रियां ङीप्।मनुष्यगुणानां स्तुतिः (न्योचनी) नि+उच समवाये-ल्युट्, ङीप्। लघुसहचरी (सूर्यायाः) म० ६। प्रेरिकायाः सूर्य्यदीप्तिवत्तेजस्विन्याः कन्यायाः (भद्रम्)शुभकर्म (इत्) एव (वासः) वस्त्रम् (गाथया) उषिकुषिगार्तिभ्यस्थन्। उ० २।४। गैगानेथन्। गानयोग्यया वेदविद्यया (एति) गच्छति (परिष्कृता) अलङ्कृता ॥
