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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (स्थूणे) हे दोनोंस्थिर स्वभाववाली [स्त्री-पुरुषों की पङ्क्ति !] (कुमार्यम्) कुमारी [कन्याअर्थात् वधू] को (देवकृते) विद्वानों के बनाये (पथि) मार्ग में (मा हिंसिष्टम्)मत कष्ट पाने दो। (देव्याः) व्यवहारयोग्य (शालायाः) शाला के (स्योनम्) सुखदायक (द्वारम्) द्वार को (वधूपथम्) वधू का मार्ग (कृण्मः) हम बनाते हैं ॥६३॥
भावार्थभाषाः - सब स्त्री-पुरुष प्रयत्न करें कि पितृकुल से पृथक् होकर वधू प्रसन्न रहे और जैसे सुन्दर स्वच्छशाला के सुन्दर स्वच्छ द्वार में होकर जाने-आने में सुख होता है, वैसे हीसुप्रबन्धवाले गृहाश्रम में वधू को सुख मिले ॥६३॥
टिप्पणी: ६३−(मा हिंसिष्टम्) दुःखं माप्रापयतम् (कुमार्यम्) कुमारीम्। वधूम् (स्थूणे) रास्नासास्नास्थूणावीणाः। उ०३।१५। ष्ठा गतिनिवृत्तौ-न प्रत्ययः, टाप्, आकारस्य ऊत्वं नस्य णत्वं च। हेस्थिरस्वभावे स्त्रीपुरुषपङ्क्ती (देवकृते) विदुषां रचिते (पथि) मार्गे (शालायाः) (देव्याः) व्यवहारयोग्यायाः (स्योनम्) सुखप्रदम् (कृण्मः) कुर्मः (वधूपथम्) वधूगमनमार्गम् ॥
