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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वरुण) हे श्रेष्ठ ! (बृहस्पते) हे वेदवाणी के रक्षक ! (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले ! (सवितः) हेप्रेरणा करनेवाले [वर !] (अभ्रातृघ्नीम्) भाइयों को न सतानेवाली, (अपशुघ्नीम्)पशुओं को न मारनेवाली, (अपतिघ्नीम्) पति को न दुःख देनेवाली और (पुत्रिणीम्)श्रेष्ठ पुत्रों को उत्पन्न करनेवाली [वधू] को (अस्मभ्यम्) हमारे हित के लिये (आवह) तू ले चल ॥६२॥
भावार्थभाषाः - सब विद्वान् लोगआशीर्वाद देवें कि विद्वान् समर्थ वर विदुषी व्यवहारकुशल वधू को गृहाश्रम कीसिद्धि के लिये आदरपूर्वक ग्रहण करे ॥६२॥इस मन्त्र का मिलान करो-ऋग्वेद१०।८५।४४ ॥
टिप्पणी: ६२−(अभ्रातृघ्नीम्) हन्तेः कः, मूलविभुजादित्वात्। भ्रातॄणामहन्त्रींसुखप्रदाम् (वरुण) हे श्रेष्ठ (अपशुघ्नीम्) पशूनां सुखयित्रीम् (बृहस्पते)बृहत्या वेदवाण्या रक्षक (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् (अपतिघ्नीम्)पत्युर्मोदयित्रीम् (पुत्रिणीम्) श्रेष्ठपुत्राणां जनयित्रीम् (अस्मभ्यम्)अस्माकं पितृपक्षाणां हिताय (सवितः) हे प्रेरक वर (आ वह) आनय ॥
