पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्ये) हे प्रेरणाकरनेवाली [वा सूर्य की चमक के समान तेजवाली] वधू ! (सुकिंशुकम्) अच्छे चमकनेवाले [अग्नि वा बिजुलीवाले] वा बहुत प्रशंसनीय चालवाले, (विश्वरूपम्) नाना रूपोंवाले [शुक्ल, नील, पीत, रक्त आदि वर्णवाले, अथवा ऊँचे-नीचे मध्यम स्थानवाले], (हिरण्यवर्णम्) सुवर्ण के लिये चाहने योग्य, (सुवृतम्) अच्छे घूमनेवाले [सब ओरमुड़ जानेवाले] (सुचक्रम्) सुन्दर [दृढ़, शीघ्रगामी] पहियोंवाले (वहतुम्) रथ पर [गृहाश्रमरूप गाड़ी पर] (त्वम्) तू (आ रोह) चढ़, और (पतिभ्यः) पतिकुलवालों केलिये (वहतुम्) [अपने] पहुँचने को (अमृतस्य) अमरपन [पुरुषार्थ] का (स्योनम्)सुखदायक (लोकम्) लोक [संसार का स्थान] (कृणु) बना ॥६१॥
भावार्थभाषाः - जैसे चतुर महारथी धन-धान्य से परिपूर्ण सुदृढ़ रथ पर अपने साथियों सहित चढ़ कर इच्छानुसार विचर करकार्य सिद्धि करता है, वैसे ही समझदार स्त्री तथा पुरुष गृहाश्रम में प्रवेश करके सुप्रबन्ध से अपने कुटुम्बियों सहित सुख भोगें ॥६१॥यह मन्त्र कुछ भेद सेऋग्वेद में है−१०।८५।२०, तथा महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण मेंरथ पर वधू को वर के चढ़ा ले जाने में विनियुक्त है, और निरुक्त १२।८ मेंव्याख्यात है ॥