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प्र त्वा॑मुञ्चामि॒ वरु॑णस्य॒ पाशा॒द्येन॒ त्वाब॑ध्नात्सवि॒ता सु॒शेवाः॑। उ॒रुं लो॒कंसु॒गमत्र॒ पन्थां॑ कृणोमि॒ तुभ्यं॑ स॒हप॑त्न्यै वधु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । त्वा । मुञ्चामि । वरुणस्य । पाशात् । येन । त्वा । अबध्नात् । सविता । सुऽशेवा: । उरुम् । लोकम् । सुगऽगम् । अत्र । पन्थाम् । कृणोमि । तुभ्यम् । सहऽपत्न्यै । वधु ॥१.५८॥

अथर्ववेद » काण्ड:14» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:58


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

विवाह संस्कार का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे वधू !] (त्वा)तुझे (वरुणस्य) रुकावट [विघ्न] के (पाशात्) बन्धन से (प्र मुञ्चामि) मैं [वर]अच्छे प्रकार छुड़ाता हूँ, (येन) जिसके साथ (त्वा) तुझे (सुशेवाः) अत्यन्त सेवायोग्य (सविता) जन्मदाता पिता ने (अबध्नात्) बाँधा है। (वधु) हे वधू ! (सहपत्न्यै) पति के साथ वर्तमान (तुभ्यम्) तेरे लिये (अत्र) यहाँ[गृहाश्रम में] (उरुम्) चौड़ा (लोकम्) घर और (सुगम्) सुगम (पन्थाम्) मार्ग (कृणोमि) मैं [पति]बनाता हूँ ॥५८॥
भावार्थभाषाः - जिस कन्या को पिता नेयोग्य पति के मिलने तक रोका था, वह कन्या योग्य पति के साथ सुखपूर्वक सुप्रबन्धकरके गृहाश्रम का कर्तव्य करे और उसी प्रकार पति भी पुरुषार्थ करके पत्नी के साथप्रीति से रहे ॥५८॥इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध ऊपर मन्त्र १९ में आ चुका है॥५८॥
टिप्पणी: ५८−पूर्वार्द्धो व्याख्यातः-म० १९ (उरुम्) विस्तृतम् (लोकम्) गृहम् (सुगम्)सुखेन गन्तव्यम् (अत्र) अस्मिन् गृहाश्रमे (पन्थाम्) पन्थानम् (कृणोमि) करोमि (तुभ्यम्) (सहपत्न्यै) पत्या सह वर्तमानायै (वधु) हे पत्नि ॥