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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह संस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रथमः) पहिले से हीवर्तमान (बृहस्पतिः) बड़े-बड़े लोकों के स्वामी [परमेश्वर] ने (सूर्यायाः)प्रेरणा करनेवाली [वा सूर्य की चमक के समान तेजवाली] कन्या के (शीर्षे) मस्तक पर (केशान्) केशों को (अकल्पयत्) बनाया है। (तेन) इस [कारण] से (अश्विना) हे विद्याको प्राप्त दोनों [स्त्री-पुरुषों के समाज !] (इमाम् नारीम्) इस नारी को (पत्ये)पति के लिये (सम्) ठीक-ठीक (शोभयामसि) हम शोभायमान करते हैं ॥५५॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने शिर केकेशों और वैसे ही शरीर के अङ्गों को अपने-अपने प्रयोजन के लिये सुडौल बनाया है।गुरुजनों को योग्य है कि वधू-वर को संसार के हित के लिये विद्या सुशीलता आदि सेसुशिक्षित करें कि वे अपने शरीर के अङ्गों को सुडौल और हृष्ट-पुष्ट रक्खें ॥५५॥
टिप्पणी: ५५−(बृहस्पतिः) महतां लोकानां पालकः परमेश्वरः (प्रथमः) अग्रे वर्तमानः (सूर्यायाः) प्रेरिकायाः सूर्यवत्तेजस्विन्याः कन्यायाः (शीर्षे) मस्तके (केशान्) (अकल्पयत्) रचितवान् (तेन) कारणेन (इमाम्) विदुषीम् (अश्विनौ) हेप्राप्तविद्यौ स्त्रीपुरुषसमूहौ (नारीम्) नरपत्नीम् (पत्ये) स्वामिने (सम्)सम्यक् (शोभयामसि) शोभयामः। भूषयामः ॥
